सीता सोरेन की झामुमो में वापसी की अटकलें तेज, क्या फिर बदलेगी सियासी राह?

सीता सोरेन की झामुमो में वापसी की अटकलें तेज, क्या फिर बदलेगी सियासी राह?
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सीता सोरेन की झामुमो में वापसी की अटकलें तेज, क्या फिर बदलेगी सियासी राह?

(संवाददाता) | झारखंड की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हुईं पूर्व विधायक सीता सोरेन की घर वापसी की चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं। हाल ही में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में हार के बाद उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं कि वे झामुमो में लौट सकती हैं। हालांकि, इस पर उन्होंने अभी तक कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया है, लेकिन उनकी हाल की गतिविधियों ने अटकलों को और बल दिया है।

भाजपा में जाने के बाद दो बार हार का सामना

सीता सोरेन ने झामुमो से नाता तोड़कर भाजपा का दामन थामा था और 2024 के लोकसभा चुनाव में दुमका सीट से चुनाव लड़ा था, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद विधानसभा चुनाव में उन्होंने जामताड़ा सीट से अपनी किस्मत आजमाई, लेकिन वहां भी उन्हें पराजय मिली। लगातार दो चुनाव हारने के बाद अब उनके राजनीतिक भविष्य पर सवाल उठ रहे हैं। इस बीच, झारखंड की सियासत में चर्चा तेज है कि वे झामुमो में वापसी कर सकती हैं।

मीडिया से बातचीत में दिया गोलमोल जवाब

जब मीडिया ने उनसे झामुमो में वापसी को लेकर सवाल किया, तो उन्होंने कोई सीधा जवाब नहीं दिया। उन्होंने कहा, “समय सब कुछ बताता है” और “परिस्थिति सब काम करवाती है।” उनका यह बयान राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। उन्होंने यह भी बताया कि वे 1 फरवरी को दुमका पहुंच रही हैं और वहां सरस्वती पूजा के कार्यक्रमों में शामिल होंगी। हालांकि, इस दौरान किसी भी राजनीतिक मुद्दे पर चर्चा करने से उन्होंने बचने की कोशिश की।

झामुमो स्थापना दिवस पर रहेगा सबकी नजरें

झामुमो अपना स्थापना दिवस समारोह 2 फरवरी को दुमका में बड़े स्तर पर मनाने जा रहा है। पार्टी ने इसे खास बनाने के लिए पूरी तैयारी कर ली है। पिछले साल, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई के चलते मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इस कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाए थे, लेकिन इस बार उनकी मौजूदगी तय मानी जा रही है।

झामुमो के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि इस बार पार्टी अपनी चुनावी सफलता का जश्न बड़े स्तर पर मनाना चाहती है। हाल ही में हुए झारखंड विधानसभा चुनाव में झामुमो को शानदार जीत मिली थी, जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं में नया जोश देखने को मिल रहा है।

झामुमो के विधायक बसंत सोरेन का बयान

सीता सोरेन की पार्टी में वापसी को लेकर झामुमो के वरिष्ठ नेता और दुमका के विधायक बसंत सोरेन ने कहा कि उन्हें इस विषय में कोई जानकारी नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल वे पार्टी के स्थापना दिवस के आयोजन की तैयारियों में व्यस्त हैं और इस समय कार्यकर्ताओं में जबरदस्त उत्साह है।

सीता सोरेन की वापसी पर झामुमो नेतृत्व का क्या होगा रुख?

अगर सीता सोरेन वाकई में झामुमो में वापसी का मन बना रही हैं, तो बड़ा सवाल यह है कि पार्टी नेतृत्व उन्हें फिर से स्वीकार करेगा या नहीं? झामुमो छोड़कर भाजपा में जाने और फिर वापस लौटने की स्थिति में पार्टी के अंदर भी मतभेद उभर सकते हैं।

झामुमो के कुछ वरिष्ठ नेता मानते हैं कि अगर उन्होंने पार्टी छोड़ी थी, तो अब उनकी वापसी से पार्टी को कोई विशेष लाभ नहीं होगा। वहीं, कुछ का मानना है कि उनके अनुभव और राजनीतिक प्रभाव को देखते हुए पार्टी उन्हें फिर से अपना सकती है।

सीता सोरेन की राजनीतिक यात्रा

  • सीता सोरेन झारखंड की एक प्रभावशाली आदिवासी नेता रही हैं।
  • वे झामुमो के संस्थापक नेता शिबू सोरेन की बहू हैं और पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की भाभी भी हैं।
  • वे झामुमो के टिकट पर दो बार विधायक रह चुकी हैं।
  • 2024 में उन्होंने झामुमो छोड़कर भाजपा का दामन थामा और दुमका से लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन हार गईं।
  • बाद में उन्होंने जामताड़ा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन वहां भी पराजित हो गईं।

झामुमो में वापसी से होगा कोई फायदा?

अगर सीता सोरेन झामुमो में वापसी करती हैं, तो पार्टी को कुछ राजनीतिक फायदा मिल सकता है।

  1. आदिवासी वोटों पर पकड़ – झारखंड में आदिवासी वोटरों का बड़ा प्रभाव है और सीता सोरेन की वापसी से झामुमो को फायदा हो सकता है।
  2. दुमका और संथाल परगना में मजबूत पकड़ – यह क्षेत्र झामुमो का गढ़ रहा है, और सीता सोरेन के लौटने से पार्टी को मजबूती मिल सकती है।
  3. परिवार के भीतर संबंध सुधारने का मौका – झामुमो में सोरेन परिवार का बड़ा वर्चस्व है। अगर सीता सोरेन वापस आती हैं, तो इससे उनके पारिवारिक संबंधों में भी सुधार हो सकता है।

भाजपा के लिए झटका?

अगर सीता सोरेन भाजपा छोड़कर झामुमो में लौटती हैं, तो यह भाजपा के लिए एक बड़ा झटका होगा। भाजपा ने उन्हें झामुमो के प्रभाव को कमजोर करने के लिए पार्टी में शामिल किया था, लेकिन लगातार दो चुनाव हारने के बाद उनका राजनीतिक कद भाजपा में भी कमजोर हो गया है।

क्या होगा अगला कदम?

अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सीता सोरेन 1 फरवरी को दुमका पहुंचकर क्या घोषणा करती हैं और झामुमो स्थापना दिवस के दौरान पार्टी का रुख उनके प्रति कैसा रहता है। फिलहाल, उन्होंने इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया है, लेकिन उनके हालिया बयान और गतिविधियां यह संकेत दे रही हैं कि उनकी झामुमो में वापसी की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता।

क्या सीता सोरेन अपनी पुरानी पार्टी में लौटेंगी, या फिर कोई नई राजनीतिक राह चुनेंगी? यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन झारखंड की राजनीति में हलचल तेज हो गई है।

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